“बुरा तो मानो, होली है तो क्या हुआ”

“बुरा न मानो होली है”
बचपन में जब गांव में होली खेला करता था तो अक्सर इस कहावत को सुना करता था। कभी-कभी तो बुरा भी मान जाता था लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया मैं होली के असली मायने समझते गया। होली एक भाईचारे का प्रतीक है, भारतवर्ष में हम होली को जाति-धर्म से परे, एकजुट होकर मनाते हैं। होली के पहले होलिका दहन भी इसीलिए होता है कि हम अपनी सारी गलत मंशाओं को उस होलिका में जला दें।
लेकिन पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह हम होली के आड़ में “बुरा न मानो होली है” का गलत फायदा उठाते हुए एक दूसरे को परेशान करते हैं, ये बिल्कुल ही सही नहीं है। आए दिन खबरें आती हैं कि किसी ने लड़कियों को छोड़ दिया, किसी ने रोड चलते हुए व्यक्ति को जबरदस्ती रंग लगा दिया। पिछले दिनों ही खबर आई थी कि वीर्य से भरे गुब्बारे को किसी लड़की पर फेंक दिया गया।
क्या हम एक समाज के तौर पर इस तरह के असामाजिक तत्वों को बर्दाश्त कर सकते हैं? कहां जा रहा है हमारा समाज? किस विचारधारा से के साथ जी रहे हैं हम? किस ओर बढ़ रहे हैं हम? क्या हमारा देश ऐसा था? क्या हमारी परंपरा ऐसी थी? अपने दिल से पूछिए ये सारी बातें और जवाब दीजिए। मैं कतई नहीं मानता कि ये सारी सही बातें बर्दाश्त करने योग्य हैं। हमारे माता-पिता ने ऐसे संस्कार नहीं दिए। आज समाज को जरूरत है एक जिम्मेदार नागरिक की। हमारे देश को जरूरत है एक ऐसे व्यक्ति की जो सड़क पर आंख खोल कर चले, जो गलत के खिलाफ आवाज उठाए।
तो आइए इस होली कसम खाते हैं कि असामाजिक तत्वों के खिलाफ आवाज उठाएंगे और बुरा भी मानेंगे क्योंकि होली है तो क्या हुआ हमने किसी को रंग लगाने का लाइसेंस थोड़ी दे दिया है। मन है रंग लगवाएंगे, नहीं है नहीं लगवाएंगे। और हां मेरे सारे मित्रों से प्रार्थना है कि रंग उन्हीं को लगाएं जिनकी मर्जी है जबरदस्ती ना करें। धन्यवाद! होली की शुभकामनाएं!!

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